Skip to main content

काशी और गंगा

 काशी और गंगा

घाटों से टकरा कर गंगा,

मानो पत्थर को जगा रही हो ,

बात गूढ़  कुछ है ही ऐसी ,

बार-बार वो बता रही हो ।(1)


चली जटा से शंकर के वो,

धूल-भूल को हटा रही हो,

लेकर व्रत वो अविरत बहती,

अखिल पाप को मिटा रही हो।(2)


काल भाल पर कल-कल करती,

हिमखंडों गर्तों में पलती,

चली धरा में स्वतः मस्त हो,

शनैः शनैः  अतितीव्र वो चलती ।(3)


हर जंतु को हर-हर कहती,

देश, वनों को,घर-घर, कहती,

इकतारा के धुन को सुनाकर,

ध्यान मगन वो सबको करती।(4)


स्थिर जीवों को चंचल करती,

बन्जर को वो कंचन करती,

खुद ही मंच सजाकर के वो ,

विविध पात्र का मन्चन करती,(5)


बूदें बनकर  अम्बुद गिरता,

धारा की लहरों पर फिरता ,

अहोभाग्य है उस वारिद का,

खुद विलीन हो ,पावन करता।(6)


काशी में शिव-शक्ति बसकर,

चिर संस्कृति में इसको कसकर,

दक्षिण से उत्तर में बहकर,

जय भागीरथ , गंगा रहती।(7)


सरिता की धारा में मिलकर,

तारतम्य में कौन बहेगा ,

गर, शिव का नाद नहीं होगा !

ब्रह्माण्ड समूचा मौन रहेगा।(8)


शम्भू के त्रिशूल पे टिककर ,

भार पाप का कौन सहेगा,

तपोस्थली ऋषियों-संतो की ,

काशी से बढ़कर कौन वहेगा?(9)


अखिल अखण्डा वो ही सत्य है,

शेष बचा जो मधुर मिथ्य है,

लिपटे प्राणी स्वाद हेतु जो ,

कष्टकथा उनकी अकथ्य है,

कष्टकथा उनकी अकथ्य है।(10)


-/-आशीष कुमार रंजन


Comments